LPG सिलेंडर और पेट्रोल के बढ़ते दामों पर जनता के बीच उठे सवाल
नई दिल्ली। साल 2012 में जब केंद्र में दूसरी सरकार थी, तब रसोई गैस (LPG) सिलेंडर और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों को लेकर देशभर में जोरदार विरोध देखने को मिलता था। उस समय विपक्ष में रही Bharatiya Janata Party लगातार महंगाई को बड़ा मुद्दा बनाकर सरकार पर हमला करती थी।
उस दौर में घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत करीब 400 से 500 रुपये के बीच होने पर भी सड़कों पर प्रदर्शन, धरना और बयानबाजी आम बात थी। पेट्रोल की कीमतों में थोड़ी बढ़ोतरी भी राष्ट्रीय बहस बन जाती थी। विपक्ष का कहना था कि बढ़ती महंगाई से आम आदमी की कमर टूट रही है।
लेकिन अब वर्ष 2026 में तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। कई शहरों में घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत 900 रुपये के आसपास पहुंच चुकी है, जबकि पेट्रोल भी कई राज्यों में 90 से 100 रुपये प्रति लीटर के बीच बिक रहा है। इसके बावजूद पहले जैसा राजनीतिक विरोध या जनआंदोलन दिखाई नहीं देता।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि समय के साथ जनता की प्राथमिकताएं बदली हैं, वहीं सरकारें टैक्स, अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत और विकास योजनाओं का हवाला देकर कीमतों को उचित ठहराती रही हैं। दूसरी ओर विपक्ष अब इन्हीं मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है।
सोशल मीडिया पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं कि जो कीमतें 2012 में “महंगाई” मानी जाती थीं, वही आज “सामान्य” क्यों लग रही हैं? क्या जनता ने बढ़ती कीमतों को स्वीकार कर लिया है, या राजनीतिक माहौल बदल गया है?
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार 2012 से 2026 के बीच देश में महंगाई, टैक्स ढांचा, अंतरराष्ट्रीय बाजार और आमदनी—सभी में बदलाव हुआ है। लेकिन आम नागरिक आज भी रसोई गैस, पेट्रोल और रोजमर्रा की चीजों की कीमतों से सीधे प्रभावित होता है।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या महंगाई का मुद्दा केवल सत्ता और विपक्ष के हिसाब से बदलता है, या वास्तव में जनता की सोच और परिस्थितियां भी बदल चुकी हैं?
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