सोनभद्र:- आपको बता दे की जिले मै होली पर्व की खुशियां जहां रासायनिक रंगों में घुलती जा रही है वहीं जिले का आदिवासी समाज प्रकृति के रंगों पर निर्भर है। आधुनिकता की अंधी दौड़ में कुछ परिवार भले ही शामिल हो गए हों, लेकिन बहुतायत में यह समाज पारंपरिक रंग को ही पिचकारी का हिस्सा बनाता है।
दुद्धी तहसील के सबसे दुरूह व पहाड़ी इलाका बरखोरहा,बभनी,बैरखड़, करहिया, बोधाडीह, औराडंडी आदि गांवों में सालों पहले की परंपराएं आज भी जिंदा हैं। यहां के मूल निवासी चेरो, गोंड़, खरवार आदिवासी जातियां पलाश (टेसु), फूलझड़ी, सेमल आदि के फूलों से बने रंगों से होली का पर्व मनाते हैं। आदिवासियों का कहना है कि हम लोग अब तक अपने हाथों से प्राकृतिक फूलों के बनाए रंगों से ही होली खेलते आए हैं, जो आज भी अनवरत चल रहा है। हालांकि बढ़ते प्रदूषण तथा अंधाधूंध कटते जंगलों के कारण अब पर्याप्त मात्रा में फूलों का मिलना बड़ी मुश्किल हो गया है, फिर भी किसी तरह से अभी काम चलाया जा रहा है। आदिवासी शिव कुमार, रामचंद्र, बेचू, जुगूल, जितन, फूलकेश्वर ने बताया कि प्राकृतिक फूलों से बनाया गया रंग तथा गुलाल काफी टिकाऊ भी होता है। एक बार रंग लग जाए तो उसकी पहचान पूरे साल तक रहती है। सबसे खास बात कि प्राकृतिक रंगों से कभी भी किसी को कोई नुकसान या चेहरे पर कोई दाग नहीं पड़ता है…
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